"प्रकृति" प्रकृति देती है सीख हमें, है जरूरत बस उस सीख को सीखने की सहकर भार हम सबका, बस चाहती इतना है कि ना काटो तुम उन पेड़ों को जो देते तुम्हें छाया है, ना तोड़ो उन फूलों को जो महकाते इस जहान को, ना पहुंचाओ कोई नुकसान ऐसा जिससे प्रकृति सौंदर्य हो जाए फीका | जो करोगे तुम इसे नष्ट, तो भुगतोगे वैसे ही कष्ट, हैं कहावत बड़ी पुरानी, "जैसी करनी, वैसी भरनी" ना भूलो इसे कहकर कहावत पुरानी, हाँ बेशक कहावत है पुरानी मगर आज भी है सत्य पर आधारित, बस इतनी सी है "प्राकृति" की पुकार ना पहुंचाओ मुझे नुकसान, थोड़ा रखो मेरा भी ध्यान || by:- harshita hingad

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..."महंगाई"... महंगाई हो गई है इतनी की अब हम गरीबों को ही सोना पड़ता है |कैसा घोर कलयुग आ गया है, जिसकी जेब हो पैसों से भरी उसकी ही बस भूख मिटती है | खाने को अब कुछ नहीं मिलता |आज की ही मैं बात मैं बात बताऊँ, मैं गई थी आज बाजार में घंटों खड़ी रही राशन की दुकान के बाहर एक लंबी सी लाइन में, इस आस में की मेरा भी नंबर आएगा तो कुछ अपने बच्चों के लिए मैं कुछ खाने को ले सकूँ, उनका पेट तो भर जाएगा इतने पैसे तो है मेरे पास लेकिन हम गरीबों का क्या नसीब, जिनकी जेबे थी पैसों से भरी | खानदानी अंदाज लिए, अपने पेसो की अकड़ लगाकर आए कुछ लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठकर और खरीद लिया राशन का सारा सामान | इतनी बड़ी लाइन जो इतनी देर से इंतजार कर रही थी उनसे कह दिया भागो यहां से आटा खत्म हो गया | ना मिला हमें खाने को कुछ और थें सब्जियों के दाम इतने की हम खरीद ना सके, बच्चों को दूध भी पिला ना सके | मेरी तरह वह सब जो उस लाइन में थे खाली हाथी घर लौट आए | सुन ले पुकार "जन-गण-मन के देवता" बस इतनी सी मेहरबानी कर, मेरे बच्चों की तरह ना जाने कितने बच्चे होंगे यहां जो सो गए खाने के इंतजार में | ज्यादा नहीं मांगती पर बस इतना सा इंतजाम कर एक रोटी का ही तू अब दान कर | सबको बराबर का हिस्सा दे दे सबकी भूख मिटा दे, ये महंगाई बड़ रही हैं "ए अन्नदाता अब तू थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर, अब तुम थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर ||By: Harshita hingad