एक लेखक हो तुम अगर तो इस कलम की कहानी को समझोगे जरूर, मोबाइल फोन में लिखने से पहले एक दफ़ा अपनी कलम से, कागज पर अपने लफ़्ज़ों को सजाओंगे जरूर |चाहे हजार तरीके दे दे यह तकनीकी युग तुम्हें, अपने लफ़्ज़ों को सजाने के लिए मगर कलम से लिखे लफ़्ज़ों की सजावट को, तुम कभी कम ना कर पाओगे एक लेखक हो तुम अगर तो इस कलम की कहानी को समझोगे जरूर ||By:- Harshita hingad

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..."महंगाई"... महंगाई हो गई है इतनी की अब हम गरीबों को ही सोना पड़ता है |कैसा घोर कलयुग आ गया है, जिसकी जेब हो पैसों से भरी उसकी ही बस भूख मिटती है | खाने को अब कुछ नहीं मिलता |आज की ही मैं बात मैं बात बताऊँ, मैं गई थी आज बाजार में घंटों खड़ी रही राशन की दुकान के बाहर एक लंबी सी लाइन में, इस आस में की मेरा भी नंबर आएगा तो कुछ अपने बच्चों के लिए मैं कुछ खाने को ले सकूँ, उनका पेट तो भर जाएगा इतने पैसे तो है मेरे पास लेकिन हम गरीबों का क्या नसीब, जिनकी जेबे थी पैसों से भरी | खानदानी अंदाज लिए, अपने पेसो की अकड़ लगाकर आए कुछ लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठकर और खरीद लिया राशन का सारा सामान | इतनी बड़ी लाइन जो इतनी देर से इंतजार कर रही थी उनसे कह दिया भागो यहां से आटा खत्म हो गया | ना मिला हमें खाने को कुछ और थें सब्जियों के दाम इतने की हम खरीद ना सके, बच्चों को दूध भी पिला ना सके | मेरी तरह वह सब जो उस लाइन में थे खाली हाथी घर लौट आए | सुन ले पुकार "जन-गण-मन के देवता" बस इतनी सी मेहरबानी कर, मेरे बच्चों की तरह ना जाने कितने बच्चे होंगे यहां जो सो गए खाने के इंतजार में | ज्यादा नहीं मांगती पर बस इतना सा इंतजाम कर एक रोटी का ही तू अब दान कर | सबको बराबर का हिस्सा दे दे सबकी भूख मिटा दे, ये महंगाई बड़ रही हैं "ए अन्नदाता अब तू थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर, अब तुम थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर ||By: Harshita hingad