वक्त "वक्त"खत्म हो जाएगी जिंदगी एक दिन मगर वक्त तो फिर भी चलता जाएगा, वक्त की अहमियत को समझ लिया तुमने तो जिंदगी के हर पल को, जी जाओगे और नहीं समझ पाए तो घड़ी को हाथों में बांधकर भी वक्त को रोक न पाओगे, उन बीते पलों को तुम कभी जी ना पाओगे खत्म हो जाएगी जिंदगी एक दिन मगर वक्त तो फिर भी चलता जाएगा | यूँ बीते वक्त को पीछे मुड़कर क्या देखता हैं ए इंसान, तू अब किसे तलाशता हैं जहां आज खड़ा है तू कल फिर पीछे मुड़कर इस वक्त को देखेगा ए इंसान, यू कब तक तू अपने आज को खोएगा खत्म हो जाएगी जिंदगी एक दिन मगर वक्त तो फिर भी चलता जाएगा | तू जी ले हर वक्त को कुछ इस कदर की वक्त भी कहे, यही है वो शख्स जिसने मुझे समझा है, खुलकर हर लमहे को जिया है, तो क्यों ना इसे जिंदगी में थोड़ा और वक्त दिया जाए... क्योंकि वक्त भी उसे ही वक्त देता है जनाब जिसने उस वक्त की अहमियत को समझा हो खत्म हो जाएगी जिंदगी एक दिन मगर वक्त तो भी चलता जाएगा ||

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..."महंगाई"... महंगाई हो गई है इतनी की अब हम गरीबों को ही सोना पड़ता है |कैसा घोर कलयुग आ गया है, जिसकी जेब हो पैसों से भरी उसकी ही बस भूख मिटती है | खाने को अब कुछ नहीं मिलता |आज की ही मैं बात मैं बात बताऊँ, मैं गई थी आज बाजार में घंटों खड़ी रही राशन की दुकान के बाहर एक लंबी सी लाइन में, इस आस में की मेरा भी नंबर आएगा तो कुछ अपने बच्चों के लिए मैं कुछ खाने को ले सकूँ, उनका पेट तो भर जाएगा इतने पैसे तो है मेरे पास लेकिन हम गरीबों का क्या नसीब, जिनकी जेबे थी पैसों से भरी | खानदानी अंदाज लिए, अपने पेसो की अकड़ लगाकर आए कुछ लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठकर और खरीद लिया राशन का सारा सामान | इतनी बड़ी लाइन जो इतनी देर से इंतजार कर रही थी उनसे कह दिया भागो यहां से आटा खत्म हो गया | ना मिला हमें खाने को कुछ और थें सब्जियों के दाम इतने की हम खरीद ना सके, बच्चों को दूध भी पिला ना सके | मेरी तरह वह सब जो उस लाइन में थे खाली हाथी घर लौट आए | सुन ले पुकार "जन-गण-मन के देवता" बस इतनी सी मेहरबानी कर, मेरे बच्चों की तरह ना जाने कितने बच्चे होंगे यहां जो सो गए खाने के इंतजार में | ज्यादा नहीं मांगती पर बस इतना सा इंतजाम कर एक रोटी का ही तू अब दान कर | सबको बराबर का हिस्सा दे दे सबकी भूख मिटा दे, ये महंगाई बड़ रही हैं "ए अन्नदाता अब तू थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर, अब तुम थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर ||By: Harshita hingad