ना खुशी में खुदकुशी क्यों करते हो..?

ना खुशी में खुदकुशी क्यों करते हो..? 

ना खुशी में खुदकुशी करके किसी की आत्मा को तुम यूँ सताओगे, फिर दर-बदर भटकोगे तुम तब भी खुश नहीं रह पाओगे | 

खुदा के दर से पैगाम आए बिना ही खुदा के यहांँ पहुंँच जाओगे, यूँ बिन बुलाए मेहमान की तरह क्या ही सुख पाओगे तुम वहांँ भी खुश नहीं रह पाओगे |

अब और नहीं सह पाओगे ये सोच कर तुम तो खुदकुशी कर जाओगे, अपनों पर क्या बीतेगी ये सोचना भी तुम भूल जाओगे तुम यह करके भी खुश नहीं रह पाओगे |

ना खुशी से अच्छा खुदकुशी करने के फेसले को क्या अब भी तुम बेहतर ही बताना चाहोगे..? 

                 "Don't give up✊
            Stop commit suicide"♀️

Written By :- Harshita hingad✍... 
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..."महंगाई"... महंगाई हो गई है इतनी की अब हम गरीबों को ही सोना पड़ता है |कैसा घोर कलयुग आ गया है, जिसकी जेब हो पैसों से भरी उसकी ही बस भूख मिटती है | खाने को अब कुछ नहीं मिलता |आज की ही मैं बात मैं बात बताऊँ, मैं गई थी आज बाजार में घंटों खड़ी रही राशन की दुकान के बाहर एक लंबी सी लाइन में, इस आस में की मेरा भी नंबर आएगा तो कुछ अपने बच्चों के लिए मैं कुछ खाने को ले सकूँ, उनका पेट तो भर जाएगा इतने पैसे तो है मेरे पास लेकिन हम गरीबों का क्या नसीब, जिनकी जेबे थी पैसों से भरी | खानदानी अंदाज लिए, अपने पेसो की अकड़ लगाकर आए कुछ लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठकर और खरीद लिया राशन का सारा सामान | इतनी बड़ी लाइन जो इतनी देर से इंतजार कर रही थी उनसे कह दिया भागो यहां से आटा खत्म हो गया | ना मिला हमें खाने को कुछ और थें सब्जियों के दाम इतने की हम खरीद ना सके, बच्चों को दूध भी पिला ना सके | मेरी तरह वह सब जो उस लाइन में थे खाली हाथी घर लौट आए | सुन ले पुकार "जन-गण-मन के देवता" बस इतनी सी मेहरबानी कर, मेरे बच्चों की तरह ना जाने कितने बच्चे होंगे यहां जो सो गए खाने के इंतजार में | ज्यादा नहीं मांगती पर बस इतना सा इंतजाम कर एक रोटी का ही तू अब दान कर | सबको बराबर का हिस्सा दे दे सबकी भूख मिटा दे, ये महंगाई बड़ रही हैं "ए अन्नदाता अब तू थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर, अब तुम थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर ||By: Harshita hingad