Topic: confident वो बदलती रात थी!थी जब चारों ओर से परेशान ये ज़िंदगी, था जितना सन्नाटा बाहर, उतना ही तेज था मन का का शोर | ना ही वो शोर की आवाज बाहर सुनाई दे सकती थी, ना ही बाहर का सन्नाटा मन को सुकून दे सकता था | घड़ी की टक-टक कानों को मानो जैसे से चुभ रही थी, ऐसा लग रहा था कि कुछ कहना चाहती है | वो घड़ी की एक-एक टक-टक का एहसास ऐसा महसूस करा रहा था, मानो जैसे जिंदगी की आखिरी घड़ियां चल रही हो | उस रात खुद पे खुद का भरोसा टूट जाने का डर था खुद से कहीं बातों पर भी शक था | ना कोई उस समय मेरे साथ था बस कागज, कलम, मैं और खुला तारों भरा आसमान, फिर हमने शुरू की हमारी बातें धीरे-धीरे मैंने एक-एक सवालों को कलम के जरिए कागज पर उतारा और फिर जब सब सवालों के जवाब खुद से मिले तब, कागज ने मुझसे कहा! क्या तुम्हें अब भी खुद पे भरोसा नहीं? क्या तुम्हें अब भी कोई डर है? हांँ तब मेरी आंखें आंसुओं से भर आई, होठों पर हल्की सी मुस्कान आई और जुबां से जोश भरे अंदाज में जवाब में इतना कह पाए कि "रख भरोसा खुद पर हर सवालों की सूलजन होगी, जब कभी कमजोर पड़े तू बस इतना कहना खुद से, रास्ते में मोड़ आया है | मेरे भरोसे की ताकत को आजमाने आया है, मगर में भी जिद्दी हूं भरोसा है खुद पर इसे भी पार कर लूंगी मगर खुद पर भरोसा ना टूटने दूंगी"उस रात के बाद मेरी जिंदगी बदल चुकी थी, परेशानियां अब जिंदगी के अवसरों में बदल चुकी थी | अब परेशानियों को ज्यादा सोचती नहीं सुलझा लिया करती हूंँ "खुद पे खुद का भरोसा है इतना ही में खुद को व्यक्त करतीं हूंँ" || By Harshita hingad

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..."महंगाई"... महंगाई हो गई है इतनी की अब हम गरीबों को ही सोना पड़ता है |कैसा घोर कलयुग आ गया है, जिसकी जेब हो पैसों से भरी उसकी ही बस भूख मिटती है | खाने को अब कुछ नहीं मिलता |आज की ही मैं बात मैं बात बताऊँ, मैं गई थी आज बाजार में घंटों खड़ी रही राशन की दुकान के बाहर एक लंबी सी लाइन में, इस आस में की मेरा भी नंबर आएगा तो कुछ अपने बच्चों के लिए मैं कुछ खाने को ले सकूँ, उनका पेट तो भर जाएगा इतने पैसे तो है मेरे पास लेकिन हम गरीबों का क्या नसीब, जिनकी जेबे थी पैसों से भरी | खानदानी अंदाज लिए, अपने पेसो की अकड़ लगाकर आए कुछ लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठकर और खरीद लिया राशन का सारा सामान | इतनी बड़ी लाइन जो इतनी देर से इंतजार कर रही थी उनसे कह दिया भागो यहां से आटा खत्म हो गया | ना मिला हमें खाने को कुछ और थें सब्जियों के दाम इतने की हम खरीद ना सके, बच्चों को दूध भी पिला ना सके | मेरी तरह वह सब जो उस लाइन में थे खाली हाथी घर लौट आए | सुन ले पुकार "जन-गण-मन के देवता" बस इतनी सी मेहरबानी कर, मेरे बच्चों की तरह ना जाने कितने बच्चे होंगे यहां जो सो गए खाने के इंतजार में | ज्यादा नहीं मांगती पर बस इतना सा इंतजाम कर एक रोटी का ही तू अब दान कर | सबको बराबर का हिस्सा दे दे सबकी भूख मिटा दे, ये महंगाई बड़ रही हैं "ए अन्नदाता अब तू थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर, अब तुम थोड़ी सी हम पर मेहरबानी कर ||By: Harshita hingad